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'विकसित भारत' और 'आत्मनिर्भर भारत' के शोर में कहीं खो तो नहीं रहा 'संवैधानिक भारत'?

आज जब हम सुबह उठकर समाचार पत्र खोलते हैं या सोशल मीडिया स्क्रॉल करते हैं, तो कुछ शब्द हमारे सामने बार-बार तैरते हैं— "विकसित भारत" , "आत्मनिर्भर भारत" और इतिहास के पन्नों से झांकता "शाइनिंग इंडिया" । ये केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि ये वो चमकीले लिफाफे हैं जिनमें देश के भविष्य की तस्वीर को लपेटकर हमारे सामने परोसा जाता है। लेकिन एक ब्लॉगर और इस देश के सजग नागरिक के तौर पर, मेरे मन में एक बुनियादी सवाल बार-बार कौंधता है: जब हमारे पास 'संवैधानिक भारत' (Constitutional India) का एक बेहद स्पष्ट, प्रगतिशील और समावेशी मार्गचित्र (Roadmap) पहले से मौजूद है, तो समय-समय पर नए नाम देकर संविधान के इस मूल स्वरूप को ओझल करने की कोशिश  तो नहीं की जा रही है ? आइए इस चिंतन प्रक्रिया (Thinking Process) और इसके पीछे की कड़वी सच्चाई को गहराई से समझने की कोशिश करते हैं। 1. 'संवैधानिक भारत' का मूल रोडमैप क्या था? डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर हमे भारत का संविधान केवल कानूनों की एक किताब नहीं दे गए है; बल्कि यह एक जीवंत दस्तावेज है। हमारे संविधान की प्रस्तावना (Preamble) ह...

डॉ. भीमराव आंबेडकर की “The Problem of the Rupee” का Reserve Bank of India (RBI) से क्या सम्बन्ध है और इसका आज का स्वरुप

लोगों से यह तो सुना होगा की RBI की नींव इसी किताब से रखी गयी है, पर कभी सोचा है की कैसे और क्या सम्बन्ध है और आज के परिवेश में इस किताब के क्या मायने है.  पहले गहरा और ऐतिहासिक संबंध समझे है। यह केवल एक किताब नहीं, बल्कि भारत की मौद्रिक (monetary) नीति की नींव रखने वाला एक महत्वपूर्ण आर्थिक दस्तावेज माना जाता है।  अब इसे विस्तार से सरल हिंदी में समझते हैं,  “Problem of Rupee” क्या थी? ब्रिटिश काल में भारत की मुद्रा (Rupee) बहुत अस्थिर थी:  कभी चांदी पर आधारित, कभी सोने से जोड़ी जाती थी और बार-बार रुपये का मूल्य (Value) गिरता-बढ़ता रहता था. इससे महंगाई (Inflation) बढ़ती थी, व्यापार में अस्थिरता आती थी, आम जनता और किसानों को नुकसान होता था.  इस किताब में उन्होंने: भारतीय मुद्रा प्रणाली का इतिहास बताया, रुपये की गिरती कीमत के कारण समझाए, ब्रिटिश सरकार की गलत नीतियों की भरकश आलोचना की और सबसे महत्वपूर्ण — समाधान (Solution) दिया। उनका मुख्य सुझाव: भारत में एक Central Bank (केंद्रीय बैंक) होना चाहिए जो मुद्रा को नियंत्रित करे और स्थिरता बनाए रखे. भारत में Reserve Bank...

मायावती जी की छोटे राज्यों की मांग और एक राष्ट्र एक चुनाव

2021 में मायावती जी ने उत्तर प्रदेश को 4 भागों में विभाजित करने का प्रस्ताव रखा था। जिसमें उन्होंने पूर्वांचल, बुंदेलखंड, अवध प्रदेश और पश्चिम प्रदेश का प्रस्ताव रखा था। एक राष्ट्र, एक चुनाव और छोटे राज्यों के निर्माण की अवधारणा शासन, प्रशासन और राजनीतिक स्थिरता के लिए उनके निहितार्थों में एक दूसरे से जुड़ी हुई है। यह मायावती के छोटे राज्यों के प्रस्ताव को अब और भी अधिक वैध बनाता है। एक राष्ट्र, एक चुनाव: यह विचार पूरे भारत में लोकसभा (संसद) और सभी राज्य विधानसभाओं के लिए एक साथ चुनाव कराने का प्रस्ताव करता है। इसका लक्ष्य चुनावों की आवृत्ति को कम करना, शासन में व्यवधानों को कम करना और चुनाव संबंधी खर्चों में कटौती करना है। छोटे राज्य: शासन पर प्रभाव छोटे राज्य स्थानीय मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करके प्रशासनिक दक्षता और शासन में सुधार कर सकते हैं। स्थिरता के साथ वे उन क्षेत्रों के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाते हैं जो अन्यथा उपेक्षित महसूस कर सकते हैं। सुव्यवस्थित शासन वाले छोटे राज्य चुनाव रसद का बेहतर प्रबंधन कर सकते हैं। छोटे राज्यों में राजनीतिक स्थिरता अधिक पाई जाती है जिससे लोगस...

स्वर्ग और संसद

मैं एक आम भारतीय नागरिक के नाते, जो लोग संविधान की सपथ ले कर (विधि द्वारा स्थापित भारत का संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखेंगे और अपने कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण से निर्वहन करेंगे तथा भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना, सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान और विधि के अनुसार न्याय करेंगे।) एक सांविधानिक पद पर बैठे है, उन्होंने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 51H का उल्लंघन कभी नहीं करना चाहिए| मेरा यह लेख उन सभी से जवाब चाहता है जो सविधान का अध्यन करते हो या सविधान को समझते हो| भारतीय संविधान, जो दुनिया के सबसे विस्तृत, समतावादी, वैज्ञानिक दृष्टिकोण देने वाला और समावेशी संविधानों में से एक है, प्रत्येक नागरिक के अधिकारों की सुरक्षा और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण के लिए मार्गदर्शन प्रदान करता है। इस तरह से सांविधानिक पद पर बैठे लोगों को और भी धयानपूर्वक इसका कड़ाई से पालन करना चाहिए| इसमें कुछ विशेष अनुच्छेद जैसे अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 51H, हमारे लोकतंत्र की नींव को मजबूत करते हैं। मैं समझाता हू इन अनुच्छेदों का उपयोग संसद में किसी भी अवास...

भाषा के साथ हमारी संस्कृति व इतिहास भी विलुप्ति पर

  पिछले हफ़्ते की बात है जब मैं अपने पुश्तैनी गाँव गया था। बहुत सालों बाद अपनी दादी से मिला और उनके मुँह से कोशारी सुनना बहुत मज़ेदार था। हमारे दादा, दादी, पिताजी, चाचा और उस समय के बहुत से लोग कोशारी बोलते थे। अब मैं देख रहा हूँ या यूँ कहूँ कि अब मैं ध्यान दे रहा हूँ, आजकल के लोग कोशरी बोलना भूल गए हैं, मैं भी उसी श्रेणी में आता हूँ, मैं कोशरी नहीं बोलता, मुझे बुरा लगा। दिल्ली वापस आने के बाद, मैंने इंटरनेट पर खोजा कि भारत की कितनी भाषाएँ व बोलिया विलुप्त हो गई हैं| यह चिंताजनक है कि भारत में 197 भाषाएँ संकटग्रस्त हैं, जिनमें से 81 असुरक्षित हैं, 63 संकटग्रस्त हैं, 6 गंभीर रूप से संकटग्रस्त हैं, 42 गंभीर रूप से संकटग्रस्त हैं और 6 पहले ही विलुप्त हो चुकी हैं। और बोलियों का तो हिसाब भी कही ठीक से नहीं मिलता|  (संदर्भ: https://economictimes.indiatimes.com/news/politics-and-nation/extinct-endangered-vulnerable-tale-of-indias-linguistic-heritage/historic-destruction/slideshow/70601865.cms और https://en.wikipedia.org/wiki/List_of_endangered_languages_in_India) दादी जी से आगे बातें...

महाराष्ट्र-२४ चुनाव और बहुजनो के लिए उसके सबक

जब दूसरी तरफ असीमित धन, प्रचुर संसाधन और पूरी व्यवस्था आपके खिलाफ हो, तो उनके विरुद्ध खड़े होना निश्चित रूप से आसान नहीं होता। यह बात महाराष्ट्र चुनाव के बाद और भी स्पष्ट हो गई है। कांग्रेस, एनसीपी, और शिवसेना जैसी बड़ी राजनीतिक पार्टियां भी मुँह के बल गिर गईं। जब सत्ता और व्यवस्था का झुकाव किसी एक पक्ष की ओर हो, तो प्रतिद्वंद्वी दलों के लिए परिस्थितियाँ और भी कठिन हो जाती हैं। यह चुनौती और बढ़ जाती है जब आप उन दबे-कुचले, वंचित, और बहिष्कृत लोगों के लिए लड़ाई लड़ रहे होते हैं, जिन्हें समाज में पहले ही पीछे धकेल दिया गया है। ऐसे में भारतीय समाज में दलित राजनीति की चुनौतियों और संघर्षों का मुद्दा सामने आता है। मायावती जी के नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने इन वर्गों के लिए अपनी आवाज़ बुलंद की है। लेकिन अक्सर आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है। अब वो लोग जो #BSP पर विचारधारा से भटकने का आरोप लगाते थे, उन्हें भी यह स्वीकार करना होगा कि संघर्ष का मैदान और उसकी कठिनाइयाँ क्या होती हैं। आलोचकों की वास्तविकता राजनीति में आलोचना करना आसान है, लेकिन जमीनी हकीकत को समझना और बदलाव के लिए प्रयास...

दलित इतिहास में 12 नवंबर

12 नवंबर दलित इतिहास में महत्वपूर्ण महत्व रखता है क्योंकि यह प्रथम गोलमेज सम्मेलन की शुरुआत का प्रतीक है, जो 12 नवंबर, 1930 से 13 जनवरी, 1931 तक चला था। यह सम्मेलन भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण क्षण था, जहाँ एक प्रमुख भारतीय नेता डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने दलित वर्गों, जिन्हें अछूत भी कहा जाता है, के लिए अलग निर्वाचिका की माँग की थी। डॉ. अंबेडकर की माँग एक अधिक समतापूर्ण समाज के लिए उनके दृष्टिकोण दर्शाती थी, जहाँ हाशिए पर पड़े समुदायों को राजनीतिक प्रक्रिया में आवाज़ मिल सकती थी। उनका मानना ​​था कि अलग निर्वाचिका दलित वर्गों को अपने प्रतिनिधि चुनने के लिए एक मंच प्रदान करेगी, जिससे सरकार में उनकी भागीदारी सुनिश्चित होगी। हालाँकि सम्मेलन अंततः अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में विफल रहा, लेकिन इसने दलित अधिकारों और सशक्तिकरण के संघर्ष में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुआ। इसे कई लोग रूढिवादीओ पर एक सशक्त प्रहार भी मानते है|  सामाजिक न्याय और समानता के लिए डॉ. अंबेडकर की अटूट प्रतिबद्धता दलित कार्यकर्ताओं और नेताओं की पीढ़ियों को प्रेरित करती रही है।  प्रमुख प्रतिभागी और चर्च...

बहुजन समाज पार्टी की प्रासंगिकता और जरुरत

भारतीय राजनीती में  बहुजन समाज पार्टी का कैसा भी प्रदर्शन रहा हो पर हर आने वाले चुनाव में बहुजन समाज पार्टी का एक महत्त्व होता ही है और आगे भी रहेगा। २०२४ का चुनाव भी इससे अछूता नहीं है व बहुजन समाज पार्टी की नेता, मायावती जी,  एक प्रमुख राजनीतिक हस्ती रहती हैं।इसके कई महत्वपूर्ण कारन दिखाई देते है| दलितों, अन्य पिछड़ा वर्गों (ओबीसी) और अल्पसंख्यकों को चिहिए की बहुजन समाज पार्टी को जितना हो सके मज़बूत बनाये ताकि वो मज़बूत हो सके|  पहला वोट बैंक: उत्तर प्रदेश ही नहीं भारतवर्ष में दलित वोट बैंक पर मायावती का अच्छा खासा प्रभाव है. दलित एक महत्वपूर्ण मतदान समूह हैं, और उनका समर्थन चुनावी नतीजों को आकार देने में महत्वपूर्ण हो सकता है|  सामाजिक गठबंधन: मायावती जी, कांशीराम जी के प्रायाशो की उत्तराधिकारी है जो की दलितों, अन्य पिछड़ा वर्गों (ओबीसी) और अल्पसंख्यकों को एक साथ लाकर एक सामाजिक गठबंधन बनाने के प्रयासों के लिए जाने जाते है। और अगर लीडिंग पार्टीज इसका धयान न रखे तो यह चुनाव को कही भी मोड़ दे सकती है और एक निर्णायक कारक हो सकती है। क्षेत्रीय प्रभाव: उत्तर प्रदेश, मध्य ...

I.N.D.I.A गठबंधन और मायावती

 फिछले कुछ महीनों से बड़े जोरो शोरो से मीडिया में खबर आयी थी की मायावती जी या कहे BSP I.N.D.I.A गठबंधन में आणि वाली है, कई लोगों से बातें चल रही है और मीडिया के लोगों ने तो इसे मायावती जी का BJ party को मात देने की तुरुप की चाल बताई। फिर एक खबर आती है की मायावती जी के किसी नजदीकी पर ED की नज़र है| जिससे चित भी मेरी और पट भी मेरी वाली बात लगती है, कांग्रेस को कहने में आएगा की देखिये BJ party को हारने के लिए हमने तो शुरुआत की और I.N.D.I.A   गठबंधन को फायदा भी मिलता और अगर BSP आती नहीं तो कहते की ED से डर कर BSP नहीं आयी|  सिर्फ तीन पार्टियों की बातें करें BJP, कांग्रेस और BSP, सब का अपना अपना वोट बैंक है और कांग्रेस जो की बीजेपी को सीधे हारते हुए नहीं दिखती, BSP के वोट बैंक पर नज़र है| मेरी नज़र में कांग्रेस अपनी लाचारी और नाकामी छिपाने के लिए सब कर रही है| कांग्रेस BJP की तोड़ नहीं ला पा रही है, देश की जनता को अपने विचारधारा और अपने पार्टी से जोड़ने में नाकाम है| मैंने अभी कुछ दिनों में ही पांच छ: मैसेज देखे जहा चिंता जताई गयी की अब BJP को कैसे हराया जाये या भी BSP तो ख़तम य...

महिला या दलित प्रधान मंत्री की जरुरत आज भारतीय राजनीति में

दलित प्रधानमत्री की मांग समय समय पर भारतीय राजनीति में उठती रही है और सही भी है भारतीय समाज को एक सूत्र में बढ़ने के लिए जिससे भारतीय राजतिनि में भी बराबर प्रतिनिधित्व बना रहे| बाबा साहेब जी को भारतरत्न कब मिला यह सब जानते है| और आज बीजेपी भी वही कर रही है| बहुजनो के कई ऐसे समाजसेवी है जिनको उनका हक़ नहीं मिला है ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, पेरियार और न जाने कितने लोग है| वैसे बीजेपी हर समय दूसरों की फसल कटाने में माहिर है| आप लोग देख सकते  है की कैसे बीजेपी बाबा साहेब जी का नाम ले कर फायदा उठा रही है| बल्कि बीजेपी को सही में अगर बहुजनो की चिंता होती तो बहुजनों के महानायकों की विचार धरा को आगे बढ़ाते| कई लोग है भारतरत्न के हक़दार, उन्हें उनका हक़ दिलवाती| कांग्रेस की तरह भी बीजेपी भी बहुजनो का सिर्फ राजनैतिक उपयोग करती है और वोट बैंक तक सिमित रखती है|  आज जब दलितों पर और महिलाओं पर आये दिन अत्याचार बढ़ रहे है और सरकार इनको रोकने में नाकाम रही है, चाहे राज्य सरकारे हो या राष्ट्र किसी को भी दलितों और महिलाओं के मामले भी संवेदशील नहीं देखा गया है|  महिला सुरक्षा हो या दलित उत...

फिल्मो की बदलती कहानिया

फ़िल्में एक ओर समाज का दर्पण हैं तो दूसरी ओर मार्गदर्शक भी हैं। इन फिल्मों का समाज के लोगों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह की फिल्में आ रही हैं वे या तो धार्मिक उन्माद से भरी होती हैं या दर्शकों का ध्यान खींचने के लिए वास्तविक तथ्यों से छेड़छाड़ करती हैं या जातिगत भेदभाव को निशाना बनाती हैं। कश्मीर फाइल्स, केरल स्टोरीज़, ७२ हूरें जैसी फ़िल्में एक धर्म और एक राज्य के लिए नैरेटिव बनाने में सहायता करती है, वही आदिपुरुष और अब OMG२ जैसे फिल्मो को सेंसर बोर्ड पास कर देता है और जनता किसी धर्म की दुहाई दे कर इन फिल्मो का बैकौट करती है और उस धर्म के मानाने वाले सभी लोगों को प्रेरित करती है, उनको दबाव दिया जाता है की वो भी बैकौट में शामिल हो| पद्मावत, लाल सिंह चड्ढा और पठान की तो बात छोड़िये मुझे आज तक मुझे पता ही नहीं चला कि धर्म भावना कैसी हो गयी, कई रंग से, कही कमेंट से कैसे इतनी छोटी सोच हो जाती है पढ़े लिखे लोगों की| RRR जैसे सफल फिल्मे बड़ी सफलता से धर्म को राष्ट्रवाद से जोड़ देती है|  खैर मैंने यह पोस्ट किसी और तरफ ध्यान खींचने के लिए लिख रहा हूँ| आज कल खास करके OTT ...

माता रमाबाई - एक प्रेरणा

रमाबाई का जन्म एक गरीब परिवार में हुआ था। उनके पिता भीकू धोत्रे और माता रुक्मिणी थे। 3 बहनें और एक भाई थे। रमा की मां को दिल का दौरा पड़ा और कुछ दिनों बाद उनके पिता भीकू की भी मृत्यु हो गई। उनके चाचा और मामा ने इन सभी बच्चों की देखभाल की। सूबेदार रामजी अंबेडकर अपने बेटे भीमराव अंबेडकर के लिए दुल्हन ढूंढ रहे थे।उन्होंने रमाबाई को देखा और भीमराव के लिए पसंद कर लिए । विवाह की तिथि सुनिश्चित की गई और अप्रैल 1906 में रमाबाई का विवाह भीमराव अम्बेडकर के साथ तय हुआ। विवाह के समय रमा केवल 9 वर्ष की थी और भीमराव 14 वर्ष के थे। अब रमा, रमाबाई भीमराव आंबेडकर बन चुकी थी|  माता रमाबाई हमेशा अपने और बच्चों की बीमारी, गरीबी के कारण खाने-पीने में कठिनाई, दवाई लाने में कठिनाई के लिए चिंतित रहती थीं, लेकिन फिर भी उन्होंने इस बात का पूरा ध्यान रखा कि बाबासाहेब के काम में कोई बाधा न आए। उन्हें बाबासाहेब पर पूरा भरोसा था। वह जानता था कि एक गरीब और नीची जाति में जन्म लेना और उस तरह जीना कितना कष्टदायक होता है। इसलिए उन्होंने कभी बाबासाहेब की पढ़ाई नहीं रोकी और न ही उनके आंदोलन को रोकने की कोशिश की. ...

परिवारवाद एक राजनैतिक आरक्षण और उसका बहुजन राजनीती पर प्रभाव

लोकतांत्रिक व्यवस्था राजतंत्र से इस तरह भिन्न होती है कि जहाँ राजतंत्र में एक ही परिवार/वंश के लोगों का राजगद्दी पर बैठते है और पीढ़ी दर पीढ़ी राज करते है, वहीं लोकतंत्र में जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है। दुर्भाग्य की भारत में लोकतंत्र के बावजूद भी परिवारवाद/वंशवाद हावी है, अप्रत्यक्ष रूप से ही सही। माना की राजा नहीं चुन पते पर सांसद, विधायक और पार्षद में तो परिवारवाद देखा जा सकता है, जहां कुछ परिवारों का एकाधिपत्य चलता है। भारत में इस परिवारवादी या वंशवादी राजनीति का पुराण इतिहास रहा है। भारत की राजनीति में परिवारवाद से कोई भी राजनीतिक पार्टी अछूती नहीं रही है। राजनीतिक वंशवाद भारत की राजनीति को जकड़े हुए है। कर्णाटक विधानसभा चुनाव के बाद मैं ऐसे ही पिछले कुछ दिनों से बड़े राज्यों पर नज़र दौड़ा रहा था की बहुजन राजनीती किधर जा रही है| बिहार की बात करे तो चिराग पासवान जिनका बीजेपी के साथ पुराना नाता रहा है| वैसे आज कल तेजस्वी यादव लालू प्रसाद यादव जी के बेटे नितीश कुमार यादव जी के साथ है पर उन्हें कांग्रेस के साथ जाने में कोई परहेज दिखता नही है| राजस्तान के राजेन्द्र सिंह गुढ़ा मसल पा...

कर्णाटक विधान सभा चुनाव और मेरी निराशा

कर्नाटक विधान सभा चुनाव के विश्लेष तो आप ने काफी देखे होंगे और कई लोगों ने ख़ुशी भी जाहिर की होगी| पर मुझे इस चुनाव में भी निराशा हुयी| मैं कभी भी कांग्रेस से बीजेपी और बीजेपी से कांग्रेस सत्ता परिवर्तन नहीं चाहता था| मैंने एग्जिट पोल्स में जब जे.डी.यू को ३५ के आसपास सीटें दिखाई जा रही थी तब मैं खुश था| क्योकि जीत ना सही तीसरा फ्रंट किंग मेकर की जगह तो दिखाई दे रहा था| और तब मैं ट्वीट भी किया था|  कांग्रेस से बीजेपी और बीजेपी से कांग्रेस सत्ता परिवर्तन में बहुजनों की बात करने वाला कोई नहीं है और ना ही हम व्यवस्था परिवर्तन की उम्मीद कर सकते है| हमारे महापुरुषों ने जो व्यवस्था परिवर्तन और प्रतिनिधित्व की उम्मीद की थी क्या वो हो पायेगी? मेरा ये पक्का विश्वास है की बहुजनों की तीसरी राजनैतिक शक्ति होनी चाहिए  जो काम से काम किंग मेकर की भूमिका में हर समय रहे| इन दोनों पार्टियों के ऊपर एक प्रेशर जरूर होना चाहिए ताकि ये पार्टिया न तो हमारे हक़ का पैसा इधर उधर कर सके और न ही हमारा कोई सांविधानिक हक़ मरी हो| बहुजनों को समझाना होगा की चाहे राष्ट्रपति मुरुम जी हो या कांग्रेस प्रेजिडेंट खड़गे ...

डी. के. खापर्डे एक संगठात्मक सोच

कई महाराष्ट्रियन लोगों ने कांशीराम जी के सामाजिक आंदोलन और राजनैतिक आंदोलन में साथ दिया और डी के खापर्डे जी उनमे से थे जो अग्रणीय थे, और यह  में  कहने  में  भी अतिश्योक्ति  व गलत  नहीं की कांशीराम जी डी के खापर्डे जी के कारण ही कांशीराम बनने की राह पर चले| डी के खापर्डे जी बामसेफ के गठन से लेकर अपने परिनिर्वाण तक खापर्डे जी बामसेफ को फुले-अंबेडकरी विचारधारा का संगठन बनाने मे मेहनत और ईमानदारी के साथ लगे रहे।     डी. के. खापर्डे  जी  का जन्म 13 मई 1939 को नागपुर (महाराष्ट्र) में हुआ था। उनकी शिक्षा नागपुर में ही हुई थी।पढाई के बाद उन्होंने डिफेन्स में नौकरी ज्वाइन कर ली थी। नौकरी के वक़्त जब वे पुणे में थे, तभी कांशीराम जी और दीनाभाना वालमीकि जी उनके सम्पर्क में आये। महाराष्ट्र से होने के नाते खापर्डे जी को बाबा साहेब के बारे में व उनके संघर्ष के बारे में बखूबी पता था और उनसे वे प्रेरित थे| उन्होंने ने ही कांशीराम जी और दीनाभना जी को बाबा साहेब जी और उनके कार्यो, संघर्ष  व उनसे द्वारा चलाये आन्दोलनों  के बारे में बताया था| उ...

जाती से जातिनिरपेक्ष कब?

 इन दिनों चर्चा मे आता रहता है जातिवाद। पहले जातिवाद को समझते है| जातिवाद क्या होता है? जाति को महत्व या स्वीकृति देना और उसके आधार पर भेदभाव करना, किसी जाति विशेष को दूसरी जातियों से श्रेष्ठ बताना या मानना| पर क्या जाति को महत्व देना भी जातिवाद है या किसी एक विशिस्ट जाती की उथ्थान की बात करना भी जातिवाद है? मेरी नज़र में नहीं, जातिवाद शब्द को भेदभाव से अलग कर के नहीं देख सकते और देखना भी ठीक नहीं होगा| हम जातिवाद और जातिवादी दोनों शब्दों को एक नकारात्मक रूप से ही देखते आये है| आज कल इतिहास की तरह शब्दों का मतलब भी अपने हिसाब से बदलने का रिवाज़ चल पड़ा है| पर हमे स्पस्ट रहना होगा और ध्यान में भी रखना होगा की कौन जातिवादी है और कौन नहीं| विशिष्ट जाती के उत्थान की बातें करना या कई जातियों की हक़ की बातें करना कतई जातिवाद नहीं है| जो वंचित और मानी हुयी निचली जातियों के हक़ और उत्थान की बात करते है वो कतई जातिवादी नहीं है|  एक और शब्द है धर्मनिरक्ष जिसका अर्थ होता है किसी खास धर्म का समर्थन न करना और सभी धर्मों को बराबर मानना| मेरे हिसाब से इसी तरह जातिनिरपेक्ष शब्द होना चाहिए| हमे सभी...

बाबा साहेब जी की याद में - ६ दिसंबर विशेष - अंतिम ५ दिन

१ दिसंबर १९५६,  प्रातः ७:३० बजे थोड़ा जल्दी उठ कर बाबा साहेब ने  मथुरा रोड पर लगी प्रदर्शनी देखने जाने की इच्छा प्रकट कर सभी को आश्चर्य कर दिया, थोड़े तरोताजा और प्रफुल्लित लग रहे थी| इन दिनों बाबा साहेब अपनी किताब "बुद्धा एंड कार्ल मार्क" को पूरा करने में ही लगे रहते थे और बहार बहुत कम ही निकलते थे| करीब १:३० बजे दोपहर को प्रदर्शनी के गेट पर पहुंचे| प्रदर्शनी के एक अधिकारी ने उनकी अगवाही की और प्रदर्शनी दिखने ले गया| उनको लोगों ने चारो और से घेर लिया था| बाबा साहेब प्रदर्शनी देख कर बहुत प्रशन्न और आश्चय हुए, भगवान बुद्धा की  अलग अलग मुद्राओं में मुर्तिया कई देशों से प्रदर्शित थी| धीरे धीरे प्रदर्शनी देखने के बाद जब बाबा साहेब वापस गेट पर आये, पीछे मुड़े, एक कोने से दूसरे कोने तक नज़र दौड़ाई और बोले - "मेरे बुद्ध महान थे, मेरे बुद्ध महान थे" | सोहनलाल शास्त्री पहले से भी गेट पर मौजूद थे, बाबा साहेब के पास आये और बड़ी ही  जिज्ञासापूर्ण पूछा, इतने विभिन्न विभिन्न मुद्राओं और चेहरे में भगवान बुद्ध को दर्शाया गया है, भगवान बुद्धा की असली शक्ल कैसी होगी बड़ा भ्रम है| बाबा साहेब...

वोट का रास्ता बुद्धा और बाबा साहेब से होते हुए जाता है

 हम बहुजनो और वंचितों के लिए बुद्धा और बाबा साहेब किसी देवता से कम नहीं है और हम जाने अंजाने उनके लिए अंध भक्त बन जाते है| इसी का फायदा ले कर पहले भी और अभी भी कई लोगों के लिए यह के राजनैतिक हथकंडा है और वो जानते है की हमारे वोटों का रास्ता बुद्धा और बाबा साहेब से होते हुए उनके झोली में जा कर गिर जाता है| मुझे राजेंद्र पल गौतम भी इसके उपवाद नहीं लगते | मैंने पहले भी अपनी मंशा जाहिर की थी की क्या राजेंद्र पल गौतम दूसरे उदितराज तो नहीं? अब जब AAP पार्टी के प्रमुख प्रचारक के तौर पर उनका नाम आता है तो बहुत कुछ समझने वाली बात है| क्या यह सोची समझी चाल है, क्या केजरीवाल को पहले से अंदेशा हो चला था की अब बहुजन वोट उससे छिटकते जो रहे है, क्या राजेंद्र पाल  गौतम को बहुजन व वंचितों को आकर्षित करने के लिए हीरो बनाया गया, इससे एक और बात समझने वाली है AAP नहीं तो कौन किस के लिए राजेंद्र पल गौतम को हीरो बनाया गया BJP या BSP? पहले कांग्रेस, फिर NCP, फिर BJP और अब AAP हमारे लोगों को हीरो बना कर बहुजन व वंचितों के वोटों को लेते और ले रहे है| क्या हम धार्मिक और राजनैतिक परिपक्वता को दिखा सकते ह...

बाबा साहेब जी की २२ प्रतिज्ञाएँ - चलो बुद्ध की ओर

 22 प्रतिज्ञाएँ के बारे में कुछ भी लिखने से पहले आइए बाबासाहेब जी के जीवन के कुछ पहलुओं को देखें ताकि हम 22 प्रतिज्ञाओं के दृष्टिकोण को देख व समझ सके। यह पूर्ण रूप से मेरे व्यक्तिगत मत है|  १३ ओक्टम्बर १९३५ को येवला सम्मलेन में बाबा साहेब जी ने कहा था की अंतिम निर्णय लेने का समय आ गया है, हम हिन्दू धर्म का परित्याग कर कोई और धर्म ग्रहण करे जिसमे समानता का दर्जा मिले और उचित आचरण हो| आगे कहा की  दुर्भाग्य था की हिन्दू धर्म में जन्म हुआ जिस पर मेरा कोई अधिकार नहीं था पर मैं शपथ लेता हू की मैं हिन्दू धर्म में मरूंगा नहीं| बाबा साहब जी ने ऐसा इसीलिए कहा क्योकि इससे पहले उनका जीवन हिन्दू धर्म में सुधर लेन में ही बिता पर हिन्दू धर्म में रत्ती भर का फरक नहीं आया| उन्होंने नानकचंद रत्तू जी से कहा था की हिन्दू लोग बुरे नहीं है पर उनका धर्म ही उच नीच पर आधारित है जोकि उनके आचरण को उससे बहार निकलने नहीं देता| १४ ओक्टम्बर १९५६ दशहरे के दिन नागपुर में बाबा साहेब जी ने बुद्ध धर्म अंगीकार कर लिया| उस जगह को हम आज दीक्षाभूमि के नाम से जानते है| बाबा साहेब जी को २१ साल लग गए एक ऐसा ध...