12 नवंबर दलित इतिहास में महत्वपूर्ण महत्व रखता है क्योंकि यह प्रथम गोलमेज सम्मेलन की शुरुआत का प्रतीक है, जो 12 नवंबर, 1930 से 13 जनवरी, 1931 तक चला था। यह सम्मेलन भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण क्षण था, जहाँ एक प्रमुख भारतीय नेता डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने दलित वर्गों, जिन्हें अछूत भी कहा जाता है, के लिए अलग निर्वाचिका की माँग की थी। डॉ. अंबेडकर की माँग एक अधिक समतापूर्ण समाज के लिए उनके दृष्टिकोण दर्शाती थी, जहाँ हाशिए पर पड़े समुदायों को राजनीतिक प्रक्रिया में आवाज़ मिल सकती थी। उनका मानना था कि अलग निर्वाचिका दलित वर्गों को अपने प्रतिनिधि चुनने के लिए एक मंच प्रदान करेगी, जिससे सरकार में उनकी भागीदारी सुनिश्चित होगी। हालाँकि सम्मेलन अंततः अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में विफल रहा, लेकिन इसने दलित अधिकारों और सशक्तिकरण के संघर्ष में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुआ। इसे कई लोग रूढिवादीओ पर एक सशक्त प्रहार भी मानते है| सामाजिक न्याय और समानता के लिए डॉ. अंबेडकर की अटूट प्रतिबद्धता दलित कार्यकर्ताओं और नेताओं की पीढ़ियों को प्रेरित करती रही है। प्रमुख प्रतिभागी और चर्च...
सम्राट अशोक, छत्रपति शाहूजी महाराज, ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले, बाबा साहेब आंबेडकर जी, कांशीराम जी व अन्य महापुरुषों से प्रेरित बहुजन विषयों पर एक नज़र|