लोकतांत्रिक व्यवस्था राजतंत्र से इस तरह भिन्न होती है कि जहाँ राजतंत्र में एक ही परिवार/वंश के लोगों का राजगद्दी पर बैठते है और पीढ़ी दर पीढ़ी राज करते है, वहीं लोकतंत्र में जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है। दुर्भाग्य की भारत में लोकतंत्र के बावजूद भी परिवारवाद/वंशवाद हावी है, अप्रत्यक्ष रूप से ही सही। माना की राजा नहीं चुन पते पर सांसद, विधायक और पार्षद में तो परिवारवाद देखा जा सकता है, जहां कुछ परिवारों का एकाधिपत्य चलता है। भारत में इस परिवारवादी या वंशवादी राजनीति का पुराण इतिहास रहा है। भारत की राजनीति में परिवारवाद से कोई भी राजनीतिक पार्टी अछूती नहीं रही है। राजनीतिक वंशवाद भारत की राजनीति को जकड़े हुए है। कर्णाटक विधानसभा चुनाव के बाद मैं ऐसे ही पिछले कुछ दिनों से बड़े राज्यों पर नज़र दौड़ा रहा था की बहुजन राजनीती किधर जा रही है| बिहार की बात करे तो चिराग पासवान जिनका बीजेपी के साथ पुराना नाता रहा है| वैसे आज कल तेजस्वी यादव लालू प्रसाद यादव जी के बेटे नितीश कुमार यादव जी के साथ है पर उन्हें कांग्रेस के साथ जाने में कोई परहेज दिखता नही है| राजस्तान के राजेन्द्र सिंह गुढ़ा मसल पा...
सम्राट अशोक, छत्रपति शाहूजी महाराज, ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले, बाबा साहेब आंबेडकर जी, कांशीराम जी व अन्य महापुरुषों से प्रेरित बहुजन विषयों पर एक नज़र|