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'विकसित भारत' और 'आत्मनिर्भर भारत' के शोर में कहीं खो तो नहीं रहा 'संवैधानिक भारत'?

आज जब हम सुबह उठकर समाचार पत्र खोलते हैं या सोशल मीडिया स्क्रॉल करते हैं, तो कुछ शब्द हमारे सामने बार-बार तैरते हैं— "विकसित भारत" , "आत्मनिर्भर भारत" और इतिहास के पन्नों से झांकता "शाइनिंग इंडिया" । ये केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि ये वो चमकीले लिफाफे हैं जिनमें देश के भविष्य की तस्वीर को लपेटकर हमारे सामने परोसा जाता है। लेकिन एक ब्लॉगर और इस देश के सजग नागरिक के तौर पर, मेरे मन में एक बुनियादी सवाल बार-बार कौंधता है: जब हमारे पास 'संवैधानिक भारत' (Constitutional India) का एक बेहद स्पष्ट, प्रगतिशील और समावेशी मार्गचित्र (Roadmap) पहले से मौजूद है, तो समय-समय पर नए नाम देकर संविधान के इस मूल स्वरूप को ओझल करने की कोशिश  तो नहीं की जा रही है ? आइए इस चिंतन प्रक्रिया (Thinking Process) और इसके पीछे की कड़वी सच्चाई को गहराई से समझने की कोशिश करते हैं। 1. 'संवैधानिक भारत' का मूल रोडमैप क्या था? डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर हमे भारत का संविधान केवल कानूनों की एक किताब नहीं दे गए है; बल्कि यह एक जीवंत दस्तावेज है। हमारे संविधान की प्रस्तावना (Preamble) ह...