Skip to main content

Posts

Showing posts with the label Bahujan Leader

'विकसित भारत' और 'आत्मनिर्भर भारत' के शोर में कहीं खो तो नहीं रहा 'संवैधानिक भारत'?

आज जब हम सुबह उठकर समाचार पत्र खोलते हैं या सोशल मीडिया स्क्रॉल करते हैं, तो कुछ शब्द हमारे सामने बार-बार तैरते हैं— "विकसित भारत" , "आत्मनिर्भर भारत" और इतिहास के पन्नों से झांकता "शाइनिंग इंडिया" । ये केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि ये वो चमकीले लिफाफे हैं जिनमें देश के भविष्य की तस्वीर को लपेटकर हमारे सामने परोसा जाता है। लेकिन एक ब्लॉगर और इस देश के सजग नागरिक के तौर पर, मेरे मन में एक बुनियादी सवाल बार-बार कौंधता है: जब हमारे पास 'संवैधानिक भारत' (Constitutional India) का एक बेहद स्पष्ट, प्रगतिशील और समावेशी मार्गचित्र (Roadmap) पहले से मौजूद है, तो समय-समय पर नए नाम देकर संविधान के इस मूल स्वरूप को ओझल करने की कोशिश  तो नहीं की जा रही है ? आइए इस चिंतन प्रक्रिया (Thinking Process) और इसके पीछे की कड़वी सच्चाई को गहराई से समझने की कोशिश करते हैं। 1. 'संवैधानिक भारत' का मूल रोडमैप क्या था? डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर हमे भारत का संविधान केवल कानूनों की एक किताब नहीं दे गए है; बल्कि यह एक जीवंत दस्तावेज है। हमारे संविधान की प्रस्तावना (Preamble) ह...

डॉ. भीमराव आंबेडकर की “The Problem of the Rupee” का Reserve Bank of India (RBI) से क्या सम्बन्ध है और इसका आज का स्वरुप

लोगों से यह तो सुना होगा की RBI की नींव इसी किताब से रखी गयी है, पर कभी सोचा है की कैसे और क्या सम्बन्ध है और आज के परिवेश में इस किताब के क्या मायने है.  पहले गहरा और ऐतिहासिक संबंध समझे है। यह केवल एक किताब नहीं, बल्कि भारत की मौद्रिक (monetary) नीति की नींव रखने वाला एक महत्वपूर्ण आर्थिक दस्तावेज माना जाता है।  अब इसे विस्तार से सरल हिंदी में समझते हैं,  “Problem of Rupee” क्या थी? ब्रिटिश काल में भारत की मुद्रा (Rupee) बहुत अस्थिर थी:  कभी चांदी पर आधारित, कभी सोने से जोड़ी जाती थी और बार-बार रुपये का मूल्य (Value) गिरता-बढ़ता रहता था. इससे महंगाई (Inflation) बढ़ती थी, व्यापार में अस्थिरता आती थी, आम जनता और किसानों को नुकसान होता था.  इस किताब में उन्होंने: भारतीय मुद्रा प्रणाली का इतिहास बताया, रुपये की गिरती कीमत के कारण समझाए, ब्रिटिश सरकार की गलत नीतियों की भरकश आलोचना की और सबसे महत्वपूर्ण — समाधान (Solution) दिया। उनका मुख्य सुझाव: भारत में एक Central Bank (केंद्रीय बैंक) होना चाहिए जो मुद्रा को नियंत्रित करे और स्थिरता बनाए रखे. भारत में Reserve Bank...

स्वर्ग और संसद

मैं एक आम भारतीय नागरिक के नाते, जो लोग संविधान की सपथ ले कर (विधि द्वारा स्थापित भारत का संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखेंगे और अपने कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण से निर्वहन करेंगे तथा भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना, सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान और विधि के अनुसार न्याय करेंगे।) एक सांविधानिक पद पर बैठे है, उन्होंने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 51H का उल्लंघन कभी नहीं करना चाहिए| मेरा यह लेख उन सभी से जवाब चाहता है जो सविधान का अध्यन करते हो या सविधान को समझते हो| भारतीय संविधान, जो दुनिया के सबसे विस्तृत, समतावादी, वैज्ञानिक दृष्टिकोण देने वाला और समावेशी संविधानों में से एक है, प्रत्येक नागरिक के अधिकारों की सुरक्षा और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण के लिए मार्गदर्शन प्रदान करता है। इस तरह से सांविधानिक पद पर बैठे लोगों को और भी धयानपूर्वक इसका कड़ाई से पालन करना चाहिए| इसमें कुछ विशेष अनुच्छेद जैसे अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 51H, हमारे लोकतंत्र की नींव को मजबूत करते हैं। मैं समझाता हू इन अनुच्छेदों का उपयोग संसद में किसी भी अवास...

महाराष्ट्र-२४ चुनाव और बहुजनो के लिए उसके सबक

जब दूसरी तरफ असीमित धन, प्रचुर संसाधन और पूरी व्यवस्था आपके खिलाफ हो, तो उनके विरुद्ध खड़े होना निश्चित रूप से आसान नहीं होता। यह बात महाराष्ट्र चुनाव के बाद और भी स्पष्ट हो गई है। कांग्रेस, एनसीपी, और शिवसेना जैसी बड़ी राजनीतिक पार्टियां भी मुँह के बल गिर गईं। जब सत्ता और व्यवस्था का झुकाव किसी एक पक्ष की ओर हो, तो प्रतिद्वंद्वी दलों के लिए परिस्थितियाँ और भी कठिन हो जाती हैं। यह चुनौती और बढ़ जाती है जब आप उन दबे-कुचले, वंचित, और बहिष्कृत लोगों के लिए लड़ाई लड़ रहे होते हैं, जिन्हें समाज में पहले ही पीछे धकेल दिया गया है। ऐसे में भारतीय समाज में दलित राजनीति की चुनौतियों और संघर्षों का मुद्दा सामने आता है। मायावती जी के नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने इन वर्गों के लिए अपनी आवाज़ बुलंद की है। लेकिन अक्सर आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है। अब वो लोग जो #BSP पर विचारधारा से भटकने का आरोप लगाते थे, उन्हें भी यह स्वीकार करना होगा कि संघर्ष का मैदान और उसकी कठिनाइयाँ क्या होती हैं। आलोचकों की वास्तविकता राजनीति में आलोचना करना आसान है, लेकिन जमीनी हकीकत को समझना और बदलाव के लिए प्रयास...

दलित इतिहास में 12 नवंबर

12 नवंबर दलित इतिहास में महत्वपूर्ण महत्व रखता है क्योंकि यह प्रथम गोलमेज सम्मेलन की शुरुआत का प्रतीक है, जो 12 नवंबर, 1930 से 13 जनवरी, 1931 तक चला था। यह सम्मेलन भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण क्षण था, जहाँ एक प्रमुख भारतीय नेता डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने दलित वर्गों, जिन्हें अछूत भी कहा जाता है, के लिए अलग निर्वाचिका की माँग की थी। डॉ. अंबेडकर की माँग एक अधिक समतापूर्ण समाज के लिए उनके दृष्टिकोण दर्शाती थी, जहाँ हाशिए पर पड़े समुदायों को राजनीतिक प्रक्रिया में आवाज़ मिल सकती थी। उनका मानना ​​था कि अलग निर्वाचिका दलित वर्गों को अपने प्रतिनिधि चुनने के लिए एक मंच प्रदान करेगी, जिससे सरकार में उनकी भागीदारी सुनिश्चित होगी। हालाँकि सम्मेलन अंततः अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में विफल रहा, लेकिन इसने दलित अधिकारों और सशक्तिकरण के संघर्ष में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुआ। इसे कई लोग रूढिवादीओ पर एक सशक्त प्रहार भी मानते है|  सामाजिक न्याय और समानता के लिए डॉ. अंबेडकर की अटूट प्रतिबद्धता दलित कार्यकर्ताओं और नेताओं की पीढ़ियों को प्रेरित करती रही है।  प्रमुख प्रतिभागी और चर्च...

बहुजन समाज पार्टी की प्रासंगिकता और जरुरत

भारतीय राजनीती में  बहुजन समाज पार्टी का कैसा भी प्रदर्शन रहा हो पर हर आने वाले चुनाव में बहुजन समाज पार्टी का एक महत्त्व होता ही है और आगे भी रहेगा। २०२४ का चुनाव भी इससे अछूता नहीं है व बहुजन समाज पार्टी की नेता, मायावती जी,  एक प्रमुख राजनीतिक हस्ती रहती हैं।इसके कई महत्वपूर्ण कारन दिखाई देते है| दलितों, अन्य पिछड़ा वर्गों (ओबीसी) और अल्पसंख्यकों को चिहिए की बहुजन समाज पार्टी को जितना हो सके मज़बूत बनाये ताकि वो मज़बूत हो सके|  पहला वोट बैंक: उत्तर प्रदेश ही नहीं भारतवर्ष में दलित वोट बैंक पर मायावती का अच्छा खासा प्रभाव है. दलित एक महत्वपूर्ण मतदान समूह हैं, और उनका समर्थन चुनावी नतीजों को आकार देने में महत्वपूर्ण हो सकता है|  सामाजिक गठबंधन: मायावती जी, कांशीराम जी के प्रायाशो की उत्तराधिकारी है जो की दलितों, अन्य पिछड़ा वर्गों (ओबीसी) और अल्पसंख्यकों को एक साथ लाकर एक सामाजिक गठबंधन बनाने के प्रयासों के लिए जाने जाते है। और अगर लीडिंग पार्टीज इसका धयान न रखे तो यह चुनाव को कही भी मोड़ दे सकती है और एक निर्णायक कारक हो सकती है। क्षेत्रीय प्रभाव: उत्तर प्रदेश, मध्य ...

I.N.D.I.A गठबंधन और मायावती

 फिछले कुछ महीनों से बड़े जोरो शोरो से मीडिया में खबर आयी थी की मायावती जी या कहे BSP I.N.D.I.A गठबंधन में आणि वाली है, कई लोगों से बातें चल रही है और मीडिया के लोगों ने तो इसे मायावती जी का BJ party को मात देने की तुरुप की चाल बताई। फिर एक खबर आती है की मायावती जी के किसी नजदीकी पर ED की नज़र है| जिससे चित भी मेरी और पट भी मेरी वाली बात लगती है, कांग्रेस को कहने में आएगा की देखिये BJ party को हारने के लिए हमने तो शुरुआत की और I.N.D.I.A   गठबंधन को फायदा भी मिलता और अगर BSP आती नहीं तो कहते की ED से डर कर BSP नहीं आयी|  सिर्फ तीन पार्टियों की बातें करें BJP, कांग्रेस और BSP, सब का अपना अपना वोट बैंक है और कांग्रेस जो की बीजेपी को सीधे हारते हुए नहीं दिखती, BSP के वोट बैंक पर नज़र है| मेरी नज़र में कांग्रेस अपनी लाचारी और नाकामी छिपाने के लिए सब कर रही है| कांग्रेस BJP की तोड़ नहीं ला पा रही है, देश की जनता को अपने विचारधारा और अपने पार्टी से जोड़ने में नाकाम है| मैंने अभी कुछ दिनों में ही पांच छ: मैसेज देखे जहा चिंता जताई गयी की अब BJP को कैसे हराया जाये या भी BSP तो ख़तम य...

महिला या दलित प्रधान मंत्री की जरुरत आज भारतीय राजनीति में

दलित प्रधानमत्री की मांग समय समय पर भारतीय राजनीति में उठती रही है और सही भी है भारतीय समाज को एक सूत्र में बढ़ने के लिए जिससे भारतीय राजतिनि में भी बराबर प्रतिनिधित्व बना रहे| बाबा साहेब जी को भारतरत्न कब मिला यह सब जानते है| और आज बीजेपी भी वही कर रही है| बहुजनो के कई ऐसे समाजसेवी है जिनको उनका हक़ नहीं मिला है ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, पेरियार और न जाने कितने लोग है| वैसे बीजेपी हर समय दूसरों की फसल कटाने में माहिर है| आप लोग देख सकते  है की कैसे बीजेपी बाबा साहेब जी का नाम ले कर फायदा उठा रही है| बल्कि बीजेपी को सही में अगर बहुजनो की चिंता होती तो बहुजनों के महानायकों की विचार धरा को आगे बढ़ाते| कई लोग है भारतरत्न के हक़दार, उन्हें उनका हक़ दिलवाती| कांग्रेस की तरह भी बीजेपी भी बहुजनो का सिर्फ राजनैतिक उपयोग करती है और वोट बैंक तक सिमित रखती है|  आज जब दलितों पर और महिलाओं पर आये दिन अत्याचार बढ़ रहे है और सरकार इनको रोकने में नाकाम रही है, चाहे राज्य सरकारे हो या राष्ट्र किसी को भी दलितों और महिलाओं के मामले भी संवेदशील नहीं देखा गया है|  महिला सुरक्षा हो या दलित उत...

फिल्मो की बदलती कहानिया

फ़िल्में एक ओर समाज का दर्पण हैं तो दूसरी ओर मार्गदर्शक भी हैं। इन फिल्मों का समाज के लोगों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह की फिल्में आ रही हैं वे या तो धार्मिक उन्माद से भरी होती हैं या दर्शकों का ध्यान खींचने के लिए वास्तविक तथ्यों से छेड़छाड़ करती हैं या जातिगत भेदभाव को निशाना बनाती हैं। कश्मीर फाइल्स, केरल स्टोरीज़, ७२ हूरें जैसी फ़िल्में एक धर्म और एक राज्य के लिए नैरेटिव बनाने में सहायता करती है, वही आदिपुरुष और अब OMG२ जैसे फिल्मो को सेंसर बोर्ड पास कर देता है और जनता किसी धर्म की दुहाई दे कर इन फिल्मो का बैकौट करती है और उस धर्म के मानाने वाले सभी लोगों को प्रेरित करती है, उनको दबाव दिया जाता है की वो भी बैकौट में शामिल हो| पद्मावत, लाल सिंह चड्ढा और पठान की तो बात छोड़िये मुझे आज तक मुझे पता ही नहीं चला कि धर्म भावना कैसी हो गयी, कई रंग से, कही कमेंट से कैसे इतनी छोटी सोच हो जाती है पढ़े लिखे लोगों की| RRR जैसे सफल फिल्मे बड़ी सफलता से धर्म को राष्ट्रवाद से जोड़ देती है|  खैर मैंने यह पोस्ट किसी और तरफ ध्यान खींचने के लिए लिख रहा हूँ| आज कल खास करके OTT ...

माता रमाबाई - एक प्रेरणा

रमाबाई का जन्म एक गरीब परिवार में हुआ था। उनके पिता भीकू धोत्रे और माता रुक्मिणी थे। 3 बहनें और एक भाई थे। रमा की मां को दिल का दौरा पड़ा और कुछ दिनों बाद उनके पिता भीकू की भी मृत्यु हो गई। उनके चाचा और मामा ने इन सभी बच्चों की देखभाल की। सूबेदार रामजी अंबेडकर अपने बेटे भीमराव अंबेडकर के लिए दुल्हन ढूंढ रहे थे।उन्होंने रमाबाई को देखा और भीमराव के लिए पसंद कर लिए । विवाह की तिथि सुनिश्चित की गई और अप्रैल 1906 में रमाबाई का विवाह भीमराव अम्बेडकर के साथ तय हुआ। विवाह के समय रमा केवल 9 वर्ष की थी और भीमराव 14 वर्ष के थे। अब रमा, रमाबाई भीमराव आंबेडकर बन चुकी थी|  माता रमाबाई हमेशा अपने और बच्चों की बीमारी, गरीबी के कारण खाने-पीने में कठिनाई, दवाई लाने में कठिनाई के लिए चिंतित रहती थीं, लेकिन फिर भी उन्होंने इस बात का पूरा ध्यान रखा कि बाबासाहेब के काम में कोई बाधा न आए। उन्हें बाबासाहेब पर पूरा भरोसा था। वह जानता था कि एक गरीब और नीची जाति में जन्म लेना और उस तरह जीना कितना कष्टदायक होता है। इसलिए उन्होंने कभी बाबासाहेब की पढ़ाई नहीं रोकी और न ही उनके आंदोलन को रोकने की कोशिश की. ...

परिवारवाद एक राजनैतिक आरक्षण और उसका बहुजन राजनीती पर प्रभाव

लोकतांत्रिक व्यवस्था राजतंत्र से इस तरह भिन्न होती है कि जहाँ राजतंत्र में एक ही परिवार/वंश के लोगों का राजगद्दी पर बैठते है और पीढ़ी दर पीढ़ी राज करते है, वहीं लोकतंत्र में जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है। दुर्भाग्य की भारत में लोकतंत्र के बावजूद भी परिवारवाद/वंशवाद हावी है, अप्रत्यक्ष रूप से ही सही। माना की राजा नहीं चुन पते पर सांसद, विधायक और पार्षद में तो परिवारवाद देखा जा सकता है, जहां कुछ परिवारों का एकाधिपत्य चलता है। भारत में इस परिवारवादी या वंशवादी राजनीति का पुराण इतिहास रहा है। भारत की राजनीति में परिवारवाद से कोई भी राजनीतिक पार्टी अछूती नहीं रही है। राजनीतिक वंशवाद भारत की राजनीति को जकड़े हुए है। कर्णाटक विधानसभा चुनाव के बाद मैं ऐसे ही पिछले कुछ दिनों से बड़े राज्यों पर नज़र दौड़ा रहा था की बहुजन राजनीती किधर जा रही है| बिहार की बात करे तो चिराग पासवान जिनका बीजेपी के साथ पुराना नाता रहा है| वैसे आज कल तेजस्वी यादव लालू प्रसाद यादव जी के बेटे नितीश कुमार यादव जी के साथ है पर उन्हें कांग्रेस के साथ जाने में कोई परहेज दिखता नही है| राजस्तान के राजेन्द्र सिंह गुढ़ा मसल पा...

कर्णाटक विधान सभा चुनाव और मेरी निराशा

कर्नाटक विधान सभा चुनाव के विश्लेष तो आप ने काफी देखे होंगे और कई लोगों ने ख़ुशी भी जाहिर की होगी| पर मुझे इस चुनाव में भी निराशा हुयी| मैं कभी भी कांग्रेस से बीजेपी और बीजेपी से कांग्रेस सत्ता परिवर्तन नहीं चाहता था| मैंने एग्जिट पोल्स में जब जे.डी.यू को ३५ के आसपास सीटें दिखाई जा रही थी तब मैं खुश था| क्योकि जीत ना सही तीसरा फ्रंट किंग मेकर की जगह तो दिखाई दे रहा था| और तब मैं ट्वीट भी किया था|  कांग्रेस से बीजेपी और बीजेपी से कांग्रेस सत्ता परिवर्तन में बहुजनों की बात करने वाला कोई नहीं है और ना ही हम व्यवस्था परिवर्तन की उम्मीद कर सकते है| हमारे महापुरुषों ने जो व्यवस्था परिवर्तन और प्रतिनिधित्व की उम्मीद की थी क्या वो हो पायेगी? मेरा ये पक्का विश्वास है की बहुजनों की तीसरी राजनैतिक शक्ति होनी चाहिए  जो काम से काम किंग मेकर की भूमिका में हर समय रहे| इन दोनों पार्टियों के ऊपर एक प्रेशर जरूर होना चाहिए ताकि ये पार्टिया न तो हमारे हक़ का पैसा इधर उधर कर सके और न ही हमारा कोई सांविधानिक हक़ मरी हो| बहुजनों को समझाना होगा की चाहे राष्ट्रपति मुरुम जी हो या कांग्रेस प्रेजिडेंट खड़गे ...

डी. के. खापर्डे एक संगठात्मक सोच

कई महाराष्ट्रियन लोगों ने कांशीराम जी के सामाजिक आंदोलन और राजनैतिक आंदोलन में साथ दिया और डी के खापर्डे जी उनमे से थे जो अग्रणीय थे, और यह  में  कहने  में  भी अतिश्योक्ति  व गलत  नहीं की कांशीराम जी डी के खापर्डे जी के कारण ही कांशीराम बनने की राह पर चले| डी के खापर्डे जी बामसेफ के गठन से लेकर अपने परिनिर्वाण तक खापर्डे जी बामसेफ को फुले-अंबेडकरी विचारधारा का संगठन बनाने मे मेहनत और ईमानदारी के साथ लगे रहे।     डी. के. खापर्डे  जी  का जन्म 13 मई 1939 को नागपुर (महाराष्ट्र) में हुआ था। उनकी शिक्षा नागपुर में ही हुई थी।पढाई के बाद उन्होंने डिफेन्स में नौकरी ज्वाइन कर ली थी। नौकरी के वक़्त जब वे पुणे में थे, तभी कांशीराम जी और दीनाभाना वालमीकि जी उनके सम्पर्क में आये। महाराष्ट्र से होने के नाते खापर्डे जी को बाबा साहेब के बारे में व उनके संघर्ष के बारे में बखूबी पता था और उनसे वे प्रेरित थे| उन्होंने ने ही कांशीराम जी और दीनाभना जी को बाबा साहेब जी और उनके कार्यो, संघर्ष  व उनसे द्वारा चलाये आन्दोलनों  के बारे में बताया था| उ...

आज बहुजनों के एक मात्रा पार्टी बहुजन समाज पार्टी

 बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ही एकमात्र राष्ट्रीय पार्टी है जो आज भी कांग्रेस और भाजपा के सामने अपने दम पर खड़ी है। बहुजनों को एक मजबूत पार्टी के महत्व को समझना होगा और बहुजन समाज पार्टी के पीछे खड़ा होना होगा। यही एक पार्टी है जो की बहुजनो को सही प्रतिनिधित्व दे सकती है|  पिछले कुछ दिनों से कहा जा रहा है की बसपा और उसकी नेता मायावती जी हाल के कुछ वर्षों में राजनीतिक प्रदर्शन में चुनौतियों का सामना कर रही हैं।एक कारण ये बताया जा रहा है की बहुजन और पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) मतदाताओं के अपने मूल आधार के बाहर नए समर्थन को आकर्षित करने में पार्टी की असमर्थ रही है| दूसरा कारण ये बताते है की बसपा ने अपने मूल समर्थकों का समर्थन भी खो दिया है। इसके अलावा, मायावती जी का 2019 में समाजवादी पार्टी से नाता टूट जाना, जिसे उनकी एक "बड़ी गलती" के रूप में प्रचारित किया गया और कहा गया की बसपा उत्तर प्रदेश में अपने सबसे निचले स्तर पर हैं और अब पार्टी का कोई अस्तित्व नहीं रहा। मेरे हिसाब से राजनीती में उतार और चढाव आते रहते है उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती जी आज भी एक प्रमुख राजनीतिक हस्ती रह...

आंबेडकर और अम्बेडकरवाद

भारत के लोगों को यह समझना होगा कि अंबेडकरवाद सिर्फ एक नाम नहीं है। अम्बेडकरवाद एक धारा है। आज भी मुख्यधारा के पत्रकार और बुद्धिजीवी अम्बेडकरवाद को एक नाम अम्बेडकर मानते हैं और अम्बेडकर को मानने वालों को एक नेता (विशिष्ट दलित नेता) का अनुयायी माना जाता है।    मुख्य रूप से राजनीति में हमने 3 भागों पर विचार किया है, एक दक्षिणपंथी (अनुयायी को भाजपा माना जाता है), वामपंथी (अनुयायी को भाकपा, सीपीएम माना जाता है) और कांग्रेस मध्यमार्गी। लेकिन मेरे हिसाब से एक और तबका है जिसे अम्बेडकरवादी भी कहा जाता है जो मध्यमार्गी से ऊपर है। मैं मिडसेंटरी से ऊपर क्यों कह रहा हूं क्योंकि यह ट्रेंडी है और मिडसेंटरी के सभी मानदंडों को पूरा करता है। इसके अलावा अम्बेडकरवाद ने बहुत स्पष्ट दिशा-निर्देश लिखे हैं। अम्बेडकर द्वारा लिखित संविधान को आसानी से डिकोड किया जा सकता है। लोगों को समझाना होगा फरक आंबेडकर का अम्बेडकरवाद से| बीजेपी, कांग्रेस, आप और मेरे ख्याल से स.पा और आर. एल. दी जैसी पार्टिया भी आंबेडकर एक नाम को अपना सकती है पर अम्बेडकरवाद को नहीं| आंबेडकरवाद से बानी पार्टियो में राष्ट्रीय लेवल पर बी...

बाबू मंगू राम - पंजाब के महान समाज सुधारक

 मंगू राम जी का जन्म 14 जनवरी, १८८६ में जिला होशियारपुर के एक गांव में हुआ था,  इनके पिता, हरमन दास एक पारंपरिक चमार जाति से थे और चमड़े के व्यावसाय में थे | बाद में उन्होंने ये पेशा छोड़ दिया था। मंगू राम की मां अत्रि की मृत्यु मंगू राम के तीन साल की उम्र में हो गई थी, इसलिए पिता सहायता के लिए अपने बेटों - मंगू और उनके दो भाई पर बहुत अधिक निर्भर रहना पड़ता था। मंगू राम के पिता को उच्च जातियों के साक्षर सदस्यों पर भरोसा करने के लिए मजबूर होना पड़ता था ताकि वे बिक्री के आदेश और अन्य निर्देशों को पढ़ सकें जो की अंग्रेजो ने बनाये थे। एक घंटे के उनके पढ़ने के लिए उन्हें उन लोगों का एक दिन का कच्चा श्रम करना होगा। इसी वजह से मंगू राम के पिता अपने बेटे को प्रारंभिक शिक्षा दिलाने के लिए उत्सुक थे और मांगू राम भी पढ़ने में रूचि लेते थे| जब मंगू राम सात वर्ष के थे, तो उन्हें एक गाँव के साधु (संत) ने पढ़ाया और जल्द ही उन्होंने स्कूल पढ़ाई सुरु कर दी| निम्न जाती का होने के कारन उनके लिए पड़ना इतना आसान नहीं था| स्कूल में मंगू राम ही अनुसूचित जाति के छात्र थे| वह कक्षा में सबसे पीछे या य...

तिलका मांझी - वीरगति किस के लिए

तिलका मांझी एक पहाड़िया (पहाड़ी लोग) समुदाय में से आप कह सकते है की पहले आदिवासी नेता थे। हमारे देश के इतिहासकारो ने आदिवासियों व बहुजनों का इतिहास कभी ठीक ढंग से लिखा नहीं| शायद इसलिए की लिखना सिर्फ एक ऊंची जाती तक ही सिमित था और आदिवासियों और बहुजनों को उस समय लिखना आता नहीं था | जो कुछ भी इतिहास मिलता है उससे पता चलता है की 1784 में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह कर दिया था तिलका मांझी ने। अपने लोगों को खाने व संसाधनों की कमी को देखते हुए उन्होंने आंदोलन छेद दिया था| कुछ समय बाद उन्होंने एक आदिवासियों को एक सशस्त्र समूह बनाया और उन्हें संगठित किया। 1771 से 1784 तक उन्होंने कभी आत्मसमर्पण नहीं किया। (https://thewire.in/history/santal-hul-revolution) मांझी ने अपने लोगों के लिए लड़ाई लड़ी, उनके शब्दों ने कई आदिवासी आंदोलनों को जन्म दिया। 1774 का हल्बा विद्रोह, 1818 का भील विद्रोह और 1831 का कोल विद्रोह। 1855-56 की संथाल हुल (क्रांति) संथाल आदिवासियों और बहुजनो के किसानों द्वारा शोषक उच्च जाति के जमींदारों (जमींदारों), महाजनों के खिलाफ लड़ी गई एक ऐसी ऐतिहासिक क्रांति थी। (साहूकार),...

बाबा साहेब जी की याद में - ६ दिसंबर विशेष - अंतिम ५ दिन

१ दिसंबर १९५६,  प्रातः ७:३० बजे थोड़ा जल्दी उठ कर बाबा साहेब ने  मथुरा रोड पर लगी प्रदर्शनी देखने जाने की इच्छा प्रकट कर सभी को आश्चर्य कर दिया, थोड़े तरोताजा और प्रफुल्लित लग रहे थी| इन दिनों बाबा साहेब अपनी किताब "बुद्धा एंड कार्ल मार्क" को पूरा करने में ही लगे रहते थे और बहार बहुत कम ही निकलते थे| करीब १:३० बजे दोपहर को प्रदर्शनी के गेट पर पहुंचे| प्रदर्शनी के एक अधिकारी ने उनकी अगवाही की और प्रदर्शनी दिखने ले गया| उनको लोगों ने चारो और से घेर लिया था| बाबा साहेब प्रदर्शनी देख कर बहुत प्रशन्न और आश्चय हुए, भगवान बुद्धा की  अलग अलग मुद्राओं में मुर्तिया कई देशों से प्रदर्शित थी| धीरे धीरे प्रदर्शनी देखने के बाद जब बाबा साहेब वापस गेट पर आये, पीछे मुड़े, एक कोने से दूसरे कोने तक नज़र दौड़ाई और बोले - "मेरे बुद्ध महान थे, मेरे बुद्ध महान थे" | सोहनलाल शास्त्री पहले से भी गेट पर मौजूद थे, बाबा साहेब के पास आये और बड़ी ही  जिज्ञासापूर्ण पूछा, इतने विभिन्न विभिन्न मुद्राओं और चेहरे में भगवान बुद्ध को दर्शाया गया है, भगवान बुद्धा की असली शक्ल कैसी होगी बड़ा भ्रम है| बाबा साहेब...

Kanshi Ram is not just a name but a political way we need today

छत्रपति शाहूजी महाराज ने 21 मार्च, 1920 को मानगाँव सम्मेलन में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को भारत में उत्पीड़ित वर्गों का सच्चा नेता घोषित किया। और 2001 में, कांशी रामजी ने मायावती को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। आज 9 अक्टूबर को कांशीराम जी के महापरिनिर्वाण के दिन, मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि आज के समय में हमें छत्रपति शाहूजी महाराज और कांशी रामजी जैसे लोगों की जरूरत है जिन्होंने कई समाज सुधार कार्य किए हैं और बाबासाहेब और मायावती। जैसे नेताओं की पहचान करना और उन्हें रास्ता या मंच दिखाना। आज हम और हमारे वंचित बहुजन समाज में लोग अनेक पुस्तकें पढ़कर विद्वान बन गए हैं। शायद ऐसे विद्वान, ऐसे विचारक जिनका कोई समान नहीं है। लेकिन अगर मैं राजनीतिक सफलता को देखता हूं, तो मुझे बातचीत और भाषणों के अलावा कुछ नहीं दिखता। हर कोई अपना झंडा लिए अपने-अपने रास्ते पर अकेला खड़ा दिखाई दे रहा है। आज इतने सारे झंडे देखकर वंचित बहुजन समाज के लोग व्याकुल, विचलित और विभाजित हैं। उसे फिर से कोई कांशीराम चाहिए जो उन्हें उनके नेता से मिला सके| और यह आज के परिवेश में और भी मायने रखता है क्योकि है हर कोई बा...

What can happen with Vaman Meshram's 6 October move?

  On 8 April 1929, Bhagat Singh ji threw a bomb in the Central Legislative Assembly, Delhi. They knew that the police would be caught and jailed, but those who wanted to give a message to the people of India, that message reached the people. I see Meshram ji's action on 6th October in the same way, he didn't throw the bomb but the blast didn't work for him either. When he reached me, every Bahujan channel gave him coverage and this news reached many other WhatsApp groups. The objective was very clear, to expose the puppet governments that did not allow the programs of him and many Bahujan leaders like him. Where is the puppet control coming from? Meshram ji knew that after taking this step, he and his companions could be imprisoned, but the purpose of his bold move would be fulfilled and perhaps it would also be accomplished. Many people are asking who is Vaman Meshram, their discussions continued in the WhatsApp group. Second, Meshram ji once again put this thing in front ...