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'विकसित भारत' और 'आत्मनिर्भर भारत' के शोर में कहीं खो तो नहीं रहा 'संवैधानिक भारत'?

आज जब हम सुबह उठकर समाचार पत्र खोलते हैं या सोशल मीडिया स्क्रॉल करते हैं, तो कुछ शब्द हमारे सामने बार-बार तैरते हैं— "विकसित भारत" , "आत्मनिर्भर भारत" और इतिहास के पन्नों से झांकता "शाइनिंग इंडिया" । ये केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि ये वो चमकीले लिफाफे हैं जिनमें देश के भविष्य की तस्वीर को लपेटकर हमारे सामने परोसा जाता है। लेकिन एक ब्लॉगर और इस देश के सजग नागरिक के तौर पर, मेरे मन में एक बुनियादी सवाल बार-बार कौंधता है: जब हमारे पास 'संवैधानिक भारत' (Constitutional India) का एक बेहद स्पष्ट, प्रगतिशील और समावेशी मार्गचित्र (Roadmap) पहले से मौजूद है, तो समय-समय पर नए नाम देकर संविधान के इस मूल स्वरूप को ओझल करने की कोशिश  तो नहीं की जा रही है ? आइए इस चिंतन प्रक्रिया (Thinking Process) और इसके पीछे की कड़वी सच्चाई को गहराई से समझने की कोशिश करते हैं। 1. 'संवैधानिक भारत' का मूल रोडमैप क्या था? डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर हमे भारत का संविधान केवल कानूनों की एक किताब नहीं दे गए है; बल्कि यह एक जीवंत दस्तावेज है। हमारे संविधान की प्रस्तावना (Preamble) ह...
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डॉ. भीमराव आंबेडकर की “The Problem of the Rupee” का Reserve Bank of India (RBI) से क्या सम्बन्ध है और इसका आज का स्वरुप

लोगों से यह तो सुना होगा की RBI की नींव इसी किताब से रखी गयी है, पर कभी सोचा है की कैसे और क्या सम्बन्ध है और आज के परिवेश में इस किताब के क्या मायने है.  पहले गहरा और ऐतिहासिक संबंध समझे है। यह केवल एक किताब नहीं, बल्कि भारत की मौद्रिक (monetary) नीति की नींव रखने वाला एक महत्वपूर्ण आर्थिक दस्तावेज माना जाता है।  अब इसे विस्तार से सरल हिंदी में समझते हैं,  “Problem of Rupee” क्या थी? ब्रिटिश काल में भारत की मुद्रा (Rupee) बहुत अस्थिर थी:  कभी चांदी पर आधारित, कभी सोने से जोड़ी जाती थी और बार-बार रुपये का मूल्य (Value) गिरता-बढ़ता रहता था. इससे महंगाई (Inflation) बढ़ती थी, व्यापार में अस्थिरता आती थी, आम जनता और किसानों को नुकसान होता था.  इस किताब में उन्होंने: भारतीय मुद्रा प्रणाली का इतिहास बताया, रुपये की गिरती कीमत के कारण समझाए, ब्रिटिश सरकार की गलत नीतियों की भरकश आलोचना की और सबसे महत्वपूर्ण — समाधान (Solution) दिया। उनका मुख्य सुझाव: भारत में एक Central Bank (केंद्रीय बैंक) होना चाहिए जो मुद्रा को नियंत्रित करे और स्थिरता बनाए रखे. भारत में Reserve Bank...

मायावती जी की छोटे राज्यों की मांग और एक राष्ट्र एक चुनाव

2021 में मायावती जी ने उत्तर प्रदेश को 4 भागों में विभाजित करने का प्रस्ताव रखा था। जिसमें उन्होंने पूर्वांचल, बुंदेलखंड, अवध प्रदेश और पश्चिम प्रदेश का प्रस्ताव रखा था। एक राष्ट्र, एक चुनाव और छोटे राज्यों के निर्माण की अवधारणा शासन, प्रशासन और राजनीतिक स्थिरता के लिए उनके निहितार्थों में एक दूसरे से जुड़ी हुई है। यह मायावती के छोटे राज्यों के प्रस्ताव को अब और भी अधिक वैध बनाता है। एक राष्ट्र, एक चुनाव: यह विचार पूरे भारत में लोकसभा (संसद) और सभी राज्य विधानसभाओं के लिए एक साथ चुनाव कराने का प्रस्ताव करता है। इसका लक्ष्य चुनावों की आवृत्ति को कम करना, शासन में व्यवधानों को कम करना और चुनाव संबंधी खर्चों में कटौती करना है। छोटे राज्य: शासन पर प्रभाव छोटे राज्य स्थानीय मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करके प्रशासनिक दक्षता और शासन में सुधार कर सकते हैं। स्थिरता के साथ वे उन क्षेत्रों के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाते हैं जो अन्यथा उपेक्षित महसूस कर सकते हैं। सुव्यवस्थित शासन वाले छोटे राज्य चुनाव रसद का बेहतर प्रबंधन कर सकते हैं। छोटे राज्यों में राजनीतिक स्थिरता अधिक पाई जाती है जिससे लोगस...

स्वर्ग और संसद

मैं एक आम भारतीय नागरिक के नाते, जो लोग संविधान की सपथ ले कर (विधि द्वारा स्थापित भारत का संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखेंगे और अपने कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण से निर्वहन करेंगे तथा भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना, सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान और विधि के अनुसार न्याय करेंगे।) एक सांविधानिक पद पर बैठे है, उन्होंने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 51H का उल्लंघन कभी नहीं करना चाहिए| मेरा यह लेख उन सभी से जवाब चाहता है जो सविधान का अध्यन करते हो या सविधान को समझते हो| भारतीय संविधान, जो दुनिया के सबसे विस्तृत, समतावादी, वैज्ञानिक दृष्टिकोण देने वाला और समावेशी संविधानों में से एक है, प्रत्येक नागरिक के अधिकारों की सुरक्षा और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण के लिए मार्गदर्शन प्रदान करता है। इस तरह से सांविधानिक पद पर बैठे लोगों को और भी धयानपूर्वक इसका कड़ाई से पालन करना चाहिए| इसमें कुछ विशेष अनुच्छेद जैसे अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 51H, हमारे लोकतंत्र की नींव को मजबूत करते हैं। मैं समझाता हू इन अनुच्छेदों का उपयोग संसद में किसी भी अवास...

अंबेडकर और मानवाधिकार - १० दिसंबर विश्व मानवाधिकार दिवस

 १० दिसंबर विश्व मानवाधिकार दिवस और आंबेडकर का जिक्र न करे ऐसा हो ही नहीं सकता| डॉ. बी.आर. अंबेडकर, जिन्हें हम  "बाबासाहेब" के नाम से भी जानते है, के लिए मानवाधिकार सभी व्यक्तियों, विशेष रूप से उत्पीड़ित और हाशिए पर पड़े लोगों के लिए सामाजिक न्याय, समानता और सम्मान प्राप्त करने के लिए मौलिक थे। मानवाधिकारों के बारे में उनकी समझ स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांतों में गहराई से निहित थी, जिसे उन्होंने न्यायपूर्ण और समावेशी समाज के निर्माण के लिए आवश्यक बताया। मैंने अंबेडकर जी मानवाधिकारों को किस तरह से देखते थे, अपनी समझ के हिसाब से कुछ प्रमुख पहलू नीचे प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा हु: 1. समानता और सामाजिक न्याय बाबासाहेब जी ने इस विचार का समर्थन किया कि जाति, धर्म, लिंग या वर्ग की परवाह किए बिना सभी व्यक्ति समान हैं। उनका मानना ​​था कि जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता मानवीय गरिमा और समानता के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन करती है। उन्होंने दलितों और अन्य हाशिए पर पड़े समुदायों के अधिकारों की वकालत करते हुए जातिगत भेदभाव को खत्म करने के लिए अथक प्रयास किया। 2. गरिमा और आत...