डॉ. भीमराव आंबेडकर की “The Problem of the Rupee” का Reserve Bank of India (RBI) से क्या सम्बन्ध है और इसका आज का स्वरुप
लोगों से यह तो सुना होगा की RBI की नींव इसी किताब से रखी गयी है, पर कभी सोचा है की कैसे और क्या सम्बन्ध है और आज के परिवेश में इस किताब के क्या मायने है. पहले गहरा और ऐतिहासिक संबंध समझे है। यह केवल एक किताब नहीं, बल्कि भारत की मौद्रिक (monetary) नीति की नींव रखने वाला एक महत्वपूर्ण आर्थिक दस्तावेज माना जाता है।
अब इसे विस्तार से सरल हिंदी में समझते हैं,
“Problem of Rupee” क्या थी? ब्रिटिश काल में भारत की मुद्रा (Rupee) बहुत अस्थिर थी:
कभी चांदी पर आधारित, कभी सोने से जोड़ी जाती थी और बार-बार रुपये का मूल्य (Value) गिरता-बढ़ता रहता था. इससे महंगाई (Inflation) बढ़ती थी, व्यापार में अस्थिरता आती थी, आम जनता और किसानों को नुकसान होता था.
इस किताब में उन्होंने: भारतीय मुद्रा प्रणाली का इतिहास बताया, रुपये की गिरती कीमत के कारण समझाए, ब्रिटिश सरकार की गलत नीतियों की भरकश आलोचना की
और सबसे महत्वपूर्ण — समाधान (Solution) दिया।
उनका मुख्य सुझाव: भारत में एक Central Bank (केंद्रीय बैंक) होना चाहिए जो मुद्रा को नियंत्रित करे और स्थिरता बनाए रखे. भारत में Reserve Bank of India की स्थापना 1935 में हुई। इससे पहले, कोई मजबूत केंद्रीय बैंक नहीं था और मुद्रा नियंत्रण ब्रिटिश सरकार के हाथ में था. यह किताब Ambedkar ने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में किए गए research के आधार पर लिखी, Research 1917 से 1922 के बीच अम्बेकर द्वारा किया गया और किताब 1923 में प्रकाशित हुई.
Hilton Young Commission ने 1926 ने उनकी किताब का अध्ययन किया
उसी आधार पर RBI बनाने की सिफारिश हुई, इस कमिशन का उद्देश्य था की रुपये को स्थिर कैसे किया जाये और silver standard fail हो रहा था और exchange rate रूपए पाउंड बार-बार बदल रहा था. अंबडेकर की किताब में ये सारे उद्देश्य मिल गए और साथ में समाधान भी मिल गया की एक सेंट्रल बैंक होना चाहिए। और इसी ने RBI की नींव राखी और १ अप्रैल १९३५ में ब्रिटिश ने RBI की स्थापना कर दी । आंबेडकर चाहते थे की सेंट्रल बैंक मुद्रा स्थिर करने, महगाई और बैंकिंग व्यवस्ता को नियंत्रित में योगदान दे. आंबेडकर चाहते थी की भारतीय रुपये को सिल्वर से नहीं बल्कि सोने से नियंत्रण किया जाये। उस समय UK, USA और सभी बड़े देश सोने के मापदंड पर चलते थे. मुद्रण प्रबंधन सरकार से अगल हो, एक सेंट्रल बैंक हो, रूपए को स्थिरता मिले, पेपर मुद्रण का व्यवस्तिथ प्रबंधन हो और रुपये और पॉउंड एक्सचेंज रेट स्थिर रहे.
चलिए इतिहास की बात तो हो गयी, और जब तक सोने का मापदंड था RBI इन उद्देश्यों पर खरी भी उतरी पर आज कल ऐसा क्या हुवा की सोने को छोड़ना पड़ा|
सीधे शब्दों में: आज की दुनिया Ambedkar के समय से थोड़ी बदल चुकी है, इसलिए नीतियाँ भी बदली हैं। लेकिन इसमें कुछ ऐसे फैसले भी हैं जो उनकी सोच से अलग हैं।
आइए इसे समझते हैं:
Bretton Woods System एक अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक (monetary) व्यवस्था थी, जिसे 1944 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनाया गया था ताकि दुनिया की economy को stable किया जा सके। यह एक ऐसा system था जिसमें सभी देशों की currency US Dollar से जुड़ी (fixed) होती थी और US Dollar Gold से जुड़ा हुआ था. १ USD के बराबर ३.३ रुपये होता था. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटैन ने पहली बार रूपया को १९४९ में रुपये का अवमूल्यन किया जिससे १ USD के बराबर ४.७६ रूपया हो गया. १९६५ और १९६२ के युद्ध के बाद भारत में फॉरेन एक्सचेंज की कमी, सूखे के कारन खाने की कमी कारण फिर भारत को १९६६ को अपने रुपये का अवमूल्यन करना पड़ा और USD ७.५० रुपये के बराबर हो गया जिसे ३६% देखा गया. अमरीका ने १९७१ में गोल्ड से नाता तोड़ लिया और Bretton Woods System का अंत हो गया. अब USD मार्किट बेस्ड एक्सचेंज पर चल पड़ा. भारत अभी स्थिर रेट पर अडिग था और सरकार १ USD को ८ रुपये के आसपास रखने की कोशिश करती थी. १९९१ के आर्थिक आपदा में भारत ने अमेरिका की तरह मार्केट बेस्ड एक्सचेंज रेट अपनाया और तब से ४० फिर ६० और फिर ८० होते हुए ९३ रुपये हो गया है. बाबासाहेब द्वारा बताये दो सुझाव सोने का मापदंड और सरकार का दखल अब दोनों पूरी तरह से नहीं है. एक सुझाव सेंट्रल बैंक का जिसे हम RBI रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया कहते है जो आज भी मुद्रण और एक्सचेंज रेट को कण्ट्रोल करने के निर्णय लेता है.
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