आज जब हम सुबह उठकर समाचार पत्र खोलते हैं या सोशल मीडिया स्क्रॉल करते हैं, तो कुछ शब्द हमारे सामने बार-बार तैरते हैं—"विकसित भारत", "आत्मनिर्भर भारत" और इतिहास के पन्नों से झांकता "शाइनिंग इंडिया"। ये केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि ये वो चमकीले लिफाफे हैं जिनमें देश के भविष्य की तस्वीर को लपेटकर हमारे सामने परोसा जाता है।
लेकिन एक ब्लॉगर और इस देश के सजग नागरिक के तौर पर, मेरे मन में एक बुनियादी सवाल बार-बार कौंधता है: जब हमारे पास 'संवैधानिक भारत' (Constitutional India) का एक बेहद स्पष्ट, प्रगतिशील और समावेशी मार्गचित्र (Roadmap) पहले से मौजूद है, तो समय-समय पर नए नाम देकर संविधान के इस मूल स्वरूप को ओझल करने की कोशिश तो नहीं की जा रही है?
आइए इस चिंतन प्रक्रिया (Thinking Process) और इसके पीछे की कड़वी सच्चाई को गहराई से समझने की कोशिश करते हैं।
1. 'संवैधानिक भारत' का मूल रोडमैप क्या था?
डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर हमे भारत का संविधान केवल कानूनों की एक किताब नहीं दे गए है; बल्कि यह एक जीवंत दस्तावेज है। हमारे संविधान की प्रस्तावना (Preamble) ही देश की प्रगति का सबसे बेहतरीन ढांचा तैयार करती है:
सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय (Justice)
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास और धर्म की स्वतंत्रता (Liberty)
प्रतिष्ठा और अवसर की समता (Equality)
व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता-अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता (Fraternity)
यह रोडमैप किसी एक वर्ग, धर्म या कॉर्पोरेट घराने के लिए नहीं, बल्कि देश के आखिरी छोर पर खड़े व्यक्ति के लिए बनाया गया था। इसमें प्रगति का पैमाना बड़ी-बड़ी इमारतें, लम्बी चौड़ी सड़के या जीडीपी (GDP) के आंकड़े नहीं, बल्कि नागरिक के अधिकारों और उसकी गरिमा की सुरक्षा है।
2. 'शाइनिंग इंडिया' से 'विकसित भारत' तक: संविधान को ओझल करने का खेल
इतिहास गवाह है कि जब-जब सत्ता अपनी संवैधानिक जवाबदेही से बचना चाहती है, वह एक नया नैरेटिव (narrative) या नारा गढ़ देती है।
क. 'शाइनिंग इंडिया' (Shining India) का भ्रम
2000 के दशक की शुरुआत में 'शाइनिंग इंडिया' का नारा आया। मेट्रो शहरों में चमकती सड़कों और आईटी सेक्टर की बढ़त को दिखाकर यह दावा किया गया कि भारत चमक रहा है। उस समय लोगों को जल्दी ही समझ आ गया था कि इस चमक के पीछे ग्रामीण भारत की बदहाली, किसानों की आत्महत्याएं और बढ़ती आर्थिक असमानता कम नहीं हुयी थी। यह नारा संविधान के "किसी भी न्याय", "किसी भी तरह की स्वतंत्रता" और "किसी भी तरह की समता" के सिद्धांत को पूरा करता हो।
ख. 'आत्मनिर्भर भारत' (Atmanirbhar Bharat) की हकीकत
हाल के वर्षों में 'आत्मनिर्भरता' का नारा खूब गूंज रहा है। लेकिन जब हम गहराई से देखते हैं, तो पाते हैं कि बुनियादी जन-कल्याणकारी योजनाओं, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों से सरकार धीरे-धीरे अपने हाथ पीछे खींच रही है और इन्हें निजी हाथों (Privatization) में सौंप रही है। संविधान राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) के तहत सरकार को लोक-कल्याणकारी राज्य (Welfare State) बनाने की जिम्मेदारी देता है। लेकिन 'आत्मनिर्भरता' के नाम पर नागरिकों को उनके हाल पर छोड़ देना और कॉर्पोरेट को बढ़ावा देना क्या संवैधानिक भारत की मूल भावना के साथ मेल खाता है? क्या सुलभ और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के बिना स्वरोज़गार प्राप्त करना असंभव है? और ऐसे स्वरोज़गार से क्या आत्मनिर्भर सही में बना जा सकेगा? देश की आत्मनिर्भरता के लिए यह ज़रूरी है कि देश की संपत्ति बढ़े, न कि किसी एक व्यक्ति की।
ग. 'विकसित भारत' (Viksit Bharat) का नैरेटिव
अब बात हो रही है 2047 तक 'विकसित भारत' बनाने की। निश्चित रूप से विकास होना चाहिए, लेकिन किस कीमत पर? यदि इस विकास में अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाया जाए, न्यायपालिका की स्वतंत्रता को प्रभावित किया जाए, और समाज के हाशिए पर मौजूद लोगों (दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक) की आवाज को दबा दिया जाए, तो क्या वह वास्तव में 'विकसित' कहलाने योग्य होगा? संविधान हमें एक ऐसा लोकतंत्र देता है जहां असहमति का अधिकार सर्वोपरि है, लेकिन 'विकसित भारत' की इस नई ब्रांडिंग में असहमति को देशद्रोह के चश्मे से देखा जाने लगा है। ताजा तरीन गरीबी सूचकांक, बेरोजगारी सूचकांक और विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक और इत्यादि को देख कर सही में कहा जा सकता है 'विकसित'?
3. क्या संविधान के बताये रस्ते से भटक रहे है?
यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। आखिर क्यों शासक वर्ग 'संवैधानिक भारत' की जगह इन काल्पनिक और चमकीले नामों को आगे रखता है? इसके पीछे कुछ गहरे कारण समझ में आते है| 'विकसित भारत' या 'आत्मनिर्भर भारत' को परिभाषित और उत्तरदावित्व कौन लेता है, शायद इसे लाने वाले और उनके हिसाब से ही इन चमकीले शब्दों को परिभाषित किया जाता है और उत्तरदायित्व निर्धारित किता जाता है|
जवाबदेही से बचना (Avoiding Accountability): संविधान नागरिकों को 'अधिकार' देता है। जब आप संविधान की बात करेंगे, तो लोग शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और समानता की मांग करेंगे। इसके विपरीत, 'विकसित भारत' या 'आत्मनिर्भर भारत' जैसे नारे नागरिकों पर ही जिम्मेदारी डाल देते हैं या उन्हें एक सुदूर भविष्य के सपने में उलझाए रखते हैं, जिससे सरकार से तात्कालिक सवाल पूछना बंद हो जाता है।
बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद की स्थापना (Establishing Majority Nationalism): 'संवैधानिक भारत' विविधता, धर्मनिरपेक्षता (Secularism) और बहुलतावाद पर आधारित है। नए नारे अक्सर एक खास तरह के समरूप (homogeneous) राष्ट्रवाद को बढ़ावा देते हैं, जो बहुसंख्यकवादी राजनीति के अनुकूल होता है। इसमें संविधान के धर्मनिरपेक्ष और कल्याणकारी चरित्र को धीरे-धीरे पृष्ठभूमि में धकेल दिया जाता है।
कॉर्पोरेट-परस्त विकास को वैधता देना: संविधान संसाधनों के समान वितरण की बात करता है (अनुच्छेद 39-b और c)। लेकिन 'विकसित भारत' का मौजूदा ढांचा पूंजीपतियों के अनुकूल है। जब आप विकास की परिभाषा केवल 'शाइनिंग' या 'जीडीपी' से तय करते हैं, तो पर्यावरण विनाश और विस्थापन जैसी संवैधानिक चिंताओं को आसानी से नजरअंदाज किया जा सकता है। प्रतिनिधित्व को आपने विकसित ढंग से लाया जाता है|
बहुजन समाज कहा खड़ा है आत्मनिर्भरता व विकसित भारत में?
तरक्की की नई बुलंदियों की तरफ दिखते हुए ये चमकीले नारें कही बहुजनों के संविधानिक अधिकारों को अनदेखा तो नहीं कर रहे है? बहुजन समाज के लिए, संविधान महज़ एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं है, यह डॉ. बी.आर. अंबेडकर (बाबासाहेब) द्वारा दिया गया वह मुक्ति-पत्र है, जिसने सदियों से शोषित और वंचित लोगों को समानता, सम्मान और प्रगति का मार्ग दिखाया। सामाजिक न्याय, समानता, प्रतिनिधित्व और एक कल्याणकारी राज्य—संविधान के अभिन्न अंग और इसकी बुनियाद हैं।
निष्कर्ष: क्या है हमारा रास्ता?
एक प्रगतिशील और सच्चे भारत का रास्ता 'शाइनिंग इंडिया', 'आत्मनिर्भर भारत' या 'विकसित भारत' जैसी अस्थायी और राजनीतिक ब्रांडिंग से होकर नहीं गुजरता। हमारा एकमात्र और सबसे सुरक्षित रास्ता 'संवैधानिक भारत' (Constitutional India) से होकर ही जाता है।
जब तक हम संविधान के मूल्यों—न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता—को अपने जीवन और राजनीति के केंद्र में नहीं लाएंगे, तब तक किसी भी नारे से देश का वास्तविक विकास संभव नहीं है। हमें यह समझना होगा कि बिना संवैधानिक अधिकारों के 'विकास' केवल एक सुंदर पिंजरा है, जिसमें नागरिक आज़ाद नहीं, बल्कि बंधक होते हैं।
आइए, नारों की चकाचौंध से बाहर निकलें और अपने संविधान के मूल्यों को बचाएं, क्योंकि भारत तभी चमकेगा और आत्मनिर्भर बनेगा जब वह पूरी तरह से संवैधानिक रहेगा।
आप इस बारे में क्या सोचते हैं? क्या आपको भी लगता है कि विकास के नए नारों के बीच हमारे संवैधानिक अधिकार और मूल्य पीछे छूट रहे हैं? नीचे कमेंट सेक्शन में अपनी राय जरूर साझा करें।
Comments
Post a Comment